Thursday, August 26, 2010

आओ खोलें एक ऐसी दूकान, जहाँ पागलपंथी हो सामान..


आओ खोलें एक ऐसी दूकान,
जहाँ पागलपंथी हो सामान
सूरज पर जहाँ सेल लगी हो ,
चाँद पर प्राइस टेग टंगा हो
बतकही जहाँ मुफ्त मिलती हो,
सपनों की सस्ती कीमत हो
पेड़ों पर जहाँ टागें हो पकवान
आओ खोलें एक ऐसी दूकान

डिब्बों मे आकास मिले जहाँ
बादल के पावूच बिकतें हो ,
मेलों मई जहाँ मिलें तितलियाँ
जेबें भर भर मिलें बिजलियाँ
स्कूलों मे जहाँ उलटी गिनती
जहाँ सिखाएं बच्चे गेयान
आओ खोलें एक ऐसी दूकान

नेता जहाँ बहुत हो सस्ते
बेईमानो के बंद हो बक्से
जलेबी जहाँ हो सीधी बनती
टेडी मेडी जहा की रोटी
मोबाईल टावर अदने हो
दादा जिसपर टांगे धोती
जहा पड़ा हो उल्टा पुल्टा
खुशियों का सारा सामान
आओ खोलें एक ऐसी दूकान

खोवाबों की जहाँ आजादी हो
यादों पर जहाँ टैक्स हो भारी
रहो साथ यदि मिल जुल कर तो ,
टैक्स मे मिले छूट हर बारी
ठेलों पर जहाँ प्यार सजा हो
जहाँ दिलों का चलता हो फरमान
आओ खोलें एक ऐसी दूकान

Wednesday, July 14, 2010

नीद थी तू कहा मै तड़पता रहा


ऐय भिस्ती ज़रा एक बूँद पिला ,
थोड़ी प्यास जगा थोड़ी प्यास बुझा,
अब तो बातें सभी अनकही ही रहीं ,
कोंई उनको बोला मेरे पास बिठा ,
जो जहेन मे सरे-आम घर कर गया ,
कोंई उनको बता क्या है मेरी खता ,
दिल सुलगता रहा रात भर याद मे ,
नीद थी तू कहा मै तड़पता रहा ,
धुप निकली सुबह शाम बारिश हूई ,
तिस्नगी को मेरे पर ना राहत हूई ,
सूखे पत्ते गिरे घर के आगन मेरे ,
मै पलटता रहा तेरा होगा पता ,
सब परिंदे उड़े आसमाँ की तरफ ,
शाख कमजोर है उनको अंदेसा था ,
रिश्तों के पौध को हमने सीचा बहुत ,
सायद बंज़र जमी थी वो पनपा नहीं ,
ऐय मौला मेरे तुझसे पूछू मै क्या ,
तुझको सब है पता ,तुझको सब है पता
तू बताएगा क्यों तो बताता नहीं ,
तू बताएगा क्यों तो बताता नहीं !!

Friday, June 18, 2010


http://www.inext.co.in/epaper/inextDefault.aspx?pageno=16&editioncode=1&edate=6/18/2010

रोहन अभी साल भर पहले ही लखनऊ आया था. इससे पहले वह दिल्ली के पब्लिकेशन हाउस में काम करता था और कल ही वह लखनऊ छोड़कर बंगलुरू चला गया. वहां से उसे एक बेहद शानदार जॉब ऑफर मिला तो उससे रहा नहीं गया. हमारे आज के यूथ की भागती-दौड़ती जिंदगी में रोज नये रिश्ते, नये दोस्त, नये शहर जुड़ते जा रहे हैं. बार-बार किसी नये शहर से जुड़ना फिर बिछड़ना तो इस पीढ़ी की लाइफ स्टाइल का हिस्सा सा बनता जा रहा है. जब वह लखनऊ में था, तब वह अपने दिल्ली के दोस्तों का मिस करता था. उनके बारे में देर-देर तक ढेर सारी बातें करता था. उन बातों में न जाने कितनी शरारतें शामिल होती थीं. ठहाकों और मुस्कुराहटों को याद करते-करते कभी-कभी उसकी आंखे नम भी हो जाती थीं. उनमें से कुछ फ्रेंड्स टच में थे, कुछ से फोन पर बातें होती थीं, लेकिन कुछ तो छूट ही गये. कोई कभी-कभी चैट पर या ऑर्कुट पर टकरा जाता था लेकिन फिर काम की आपाधापी में बीच-बीच में लंबा अंतराल आ जाता था. अब, जब वह लखनऊ छोड़कर चला गया तो यहां के फ्रेंड्स और जानने वालों को एक बार फिर मिस करने का वक्त आ गया. फिर शायद अच्छी जॉब के लिए वह कहीं और स्विच ओवर करेगा और फिर कुछ और अपनों से बिछड़ने का गम. रफ्तार से चलती आज की जिंदगी में आज के यूथ के लिए यह एक कॉमन प्रॉब्लम बन गई है. बड़ी अपॉरच्युनिटी और भारी-भरकम सैलरी पैकेज के चलते अब उसका एक जगह टिककर काम करना संभव नहीं रहा. ऐसी स्थिति में उसके लिए कई अपनों और अपनों से ज्यादा कई गैरों, जो उससे कहीं ना कहीं जुड़े रहते है को छोड़ने का गम सहना पड़ता है और यकीन मानिये यह दर्द सहना इतना आसान नहीं होता. यह एक मुश्किल कदम होता है, जब हम एक ऐसे माहौल को छोड़कर जा रहे होते हैं, जहां सब कुछ हमारे कंफर्ट जोन में है लाइफ स्मूथ चल रही है. कुछ ऐसे फ्रेंड्स हैं, जो सुख-दुख बंाटने को तैयार रहते हैं. टाइमपास, मस्ती और अपनेपन को छोड़कर फिर एक नई जगह जाना और एक नया सर्किल तैयार करना आज के यूथ के लिए यह एक चैलेंज सा बन गया है. शायद यही कारण है कि दोस्तों की भीड़ सोशल नेटवर्किंग साइट्स और मोबाइल के फोन बुक में तो बढ़ती जा रही है पर कहीं ना कहीं किसी की याद अकेले में टीस मारती है. हर बार नये सिरे से नये शहर से दिल लगाना, वहां के लोगों को अपना बनाना. फिर कुछ दिनों बाद धीरे से उन सबसे हाथ छुड़ाना, पैकिंग करना और निकल पड़ना नये सफर पर. यह आज के यूथ की नियति है. जिसमें वो मुस्कुराते हुए आगे बढ़ रहा है. लेकिन जब कभी बिछड़े हुए दोस्त से किसी मोड़ पर मुलाकात होती है तो ऐसे बांछें खिलती हैं जैसे कोई खजाना मिल गया हो. पिछले दिनों एक टेलीकॉम ऑपरेटर कंपनी के विज्ञापन में कुछ ऐसी ही बात कही गयी कि ढूंढिये अपने दोस्तों को. मन में यह बात जरूर कौंधी दोस्त आखिर खो क्यों रहे हैं. क्या सफलता के पीछे भागते हम कुछ ऐसा तो नहीं खो रहे, जिसकी भरपाई मुश्किल है. पर शायद इसी को तो जिंदगी कहते हैं हम चलते रहते हैं कुछ नये, कुछ बड़े की तलाश में और हमारी पीठ पर लदा यादों का पुलिंदा भी बढ़ता रहता हैं. यादें जो कभी गुदगुदाती हैं, कभी हंसाती हैं और कभी आंखें नम कर जाती हैं. ढेर सारे अपने जो कहीं यादों में बस गये हैं, कभी-कभी उनसे मिलने, पुरानी बातें करने और गिल-शिकवे दूर करने का मन तो करता ही होगा. खैर, अभी ज्यादा देर नहीं हुई है. आइये ढूंढते हैं उन्हें, जो खो गये हैं. मनाते हैं उन्हें, जो हमसे जो रूठे हैं, हो सकता है कुछ को आप भूल गये हों या कुछ आपको भूल गये हों, देखिये कुछ तो आपके शहर में ही होंगे तो कुछ कहीं पीछे छूट गये होंगे, यह भी संभव है कि कुछ आपकी कॉल का वेट कर रहें हों या आप कुछ के कॉल का वेट कर रहे होंगे. चलिए, छोड़िये इन बातों को और आइये कोशिश करते हैं उन सबको यादों की दुनिया से बाहर लाने की, उन्हें दोबारा फिर से अपने साथ जोड़ने की जिनकी याद सताती है. यकीन मानिये आपको अच्छा लगेगा. बहुत अच्छा!

Sunday, May 9, 2010

सिर्फ माँ है और कोई नहीं

रिश्तों की रफूगर वो है एक जादूगर ,
वो ख़ुशियाँ तिनका तिनका कर जोडती है ,
वो गम सूखी लकड़ी के तरह तोडती है,
वो बददूआयें सरे फूक देती है चूल्हे मे,
उसके आचल मे समाया है सूकून का हर साजो-सामान ,
उसकी डाट,उसका प्यार,उसकी लाड ,उसका दुलार ,
न सवाल ,न जबाब ,उसका प्यार बेहिसाब 
सबका गम लेते आयी है वो अपने हिस्से ,
और बेताब रहती है ख़ुशियाँ बाटने को सबको ,
हमारी तोतली बोली सायानी हो गयी ,
घुटनों के बल चलने वाला बच्चा सा मै,
अब भागता हूँ इस बनावटी दुनिया मे ,
अपने पैरों पर..
पर उसके प्यार का बचपना आज भी तोतली बोली बोलता है ,
वो चूमती है मेरा माथा ,
जब मैं निकलता हूँ घर से कहीं जाने को ,
कमर थोड़ी झुक गयी है ,
पर वो आज भी गोद मे उठा लेना चाहती है मुझे 
वो सिर्फ माँ है और कोई नहीं ,
और उसके बिना ये दुनिया कुछ नहीं ....

Monday, April 26, 2010

जितने मे मिलते है सपने ,उतने जेब मे दाम कहाँ


बचपन के यादो मे जीता ,जीवन एक तन्हाई है ,
हरपल ढूढो साथ मगर ,मिलती हरपल रुसवाई है,
अपनों की गफलत मे देखो ,केसे तनहा खड़े है सब ,
एसे लगता जेसे कोंई ,उडती से परछाई है,
है तो सब बाज़ार सजे पर उससे अपना क्या होगा ,
जितने मे मिलते है सपने ,उतने जेब मे दाम कहाँ ,
घर से निकले दफ़नाने को ,सपने यादें जज्बातों को ,
राह मे मिल गया भटका कोंई ,लगे उससे समझाने को ,
लगता था एक दिन आएगा ,जब वो हमको समझेंगे ,
जेसे -जेसे दिन बीते ,वो लगे हमें समझाने को ,
यादों के गटठर अब फोड़ें ,चलो कहें अब दूर चलें ,
एसा ना हो सिर्फ बचे ,एक दिन हमको पछताने को

Friday, January 22, 2010

इन्टनेट की किसी साईट पर पड़ी ये तस्वीर साफ़ बताती है , की हमारे देस मे इच्छाएं पैसे से कहीं ज्यादा बड़ी है और जुगाड़ हमारी अमूल निधि है .....

Thursday, December 31, 2009

midnight poem on new year eve.

फलक पर कुछ सितारों का झुरमुट
जमी पर आतिश की कुछ चिनगारीयां
शाएद ये कोंई खास पल है ..
लोग खुश है , लोग उत्साहित है
उत्सवधर्मिता फजाओं मे घुली सी है
उत्साह एक आने वाले कल का ,
कल के नए सपनो का, नयी इच्छाओं का , वादों का ,खुशिओं का
उस अनदेखे कल का जो हम उम्मीद करते है सुखद हो ..
कल कोंई २६/११ न हो , कल कोंई रेस्सेसन न आये,
कल कोंई अपना न छूटे , कल कोंई दिल न टूटे ,
कल सूरज एक नयी रोशनी लाये ,
कल फजाएं एक नया गीत गुनगुनाएं .
कल हम अपने सपनो के ओर भागें
और मुट्ठी मे भर लायें
कल वो कल आये जब हम खुशिओं को घर लायें ....